मल्टीमीडिया डेस्क । सनातन संस्कृति में भारतवर्ष में कई स्थानों को पवित्र माना गया है। इन स्थानों का संबंध देवी-देवताओं और उनके भक्तों से रहा है। इन स्थानों को ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत माना जाता है और कई जगहों के बारे में मान्यता है कि देवी-देवता स्वयं इन जगहों पर पधारे थे। ऐसा ही एक सिद्ध स्थान सैकड़ों या हजारों नहीं बल्कि पांच हजार साल पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि महाभारतकालीन यह मंदिर पांडवों से जुड़ा हुआ है और मान्यता है कि पाण्डवों ने स्वर्गारोहण के लिए स्वर्ग की सीढ़ियों का निर्माण इसी मंदिर में किया था और महाभारत युद्ध के पश्चात इसी मंदिर में निर्मित की गई सीढ़ियों से पाण्डवों ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था।
महाभारतकालीन पाण्डवों के द्वारा निर्मित इस मंदिर को 'बाथू की लड़ी' के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर को 'बाथू' नाम इसलिए दिया गया क्योकि इस मंदिर के निर्माण में जिन पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है उनको 'बाथू' का पत्थर कहा जाता है। मंदिर परिसर में आठ मंदिर बने हुए हैं, जो दूर से देखने पर एक माला में पिरोए प्रतीत होते हैं।
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